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द्वादशः पाठः – सम्यग्वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते (सही वर्णों के प्रयोग से (या शुद्ध उच्चारण द्वारा) व्यक्ति ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठित होता है।)

अभ्यासात् जायते सिद्धिः

१. पाठे विद्यमानानां श्लोकानाम् उच्चारणं स्मरणं लेखनं च कुरुत ।

(पाठ में दिए गए श्लोकों का उच्चारण करें, उन्हें कंठस्थ करें और लिखकर अभ्यास करें।)

२. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् एकपदेन उत्तराणि लिखत – (नीचे दिए प्रश्नों के एक-शब्द वाले उत्तर लिखिए।)

(क) पाठकाः केषां सम्यक् प्रयोगं कुर्युः ? (पाठक किसका ठीक प्रकार से प्रयोग करें?)

उत्तरम्: वर्णानाम्। (वर्णों का।)

(ख) किम् अवश्यमेव पठनीयम् ? (कौन-सी वस्तु अवश्य पढ़नी चाहिए?)

उत्तरम्: व्याकरणम्। (व्याकरण।)

(ग) ब्रह्मलोके केन सम्मानं भवति ? (ब्रह्मलोक में किससे आदर मिलता है?)

उत्तरम्: सम्यग्वर्णप्रयोगेण। (वर्णों के शुद्ध प्रयोग से।)

(घ) अधमाः पाठकाः कति भवन्ति ? (निम्न कोटि के पाठक कितने होते हैं?)

उत्तरम्: षट्। (छह।)

(ङ) धैर्यं केषां गुणः ? (धैर्य किसका स्वभाविक गुण है?)

उत्तरम्: पाठकानाम्। (पाठकों का।)

३. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् पूर्णवाक्येन उत्तराणि लिखत – (नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर पूरे वाक्य में लिखिए।)

(क) व्याघ्री दंष्ट्राभ्यां कान् नयति ? (व्याघ्री (मादा बाघ) अपने दाँतों से किसे उठाकर ले जाती है?)

उत्तरम्: व्याघ्री दंष्ट्राभ्यां पुत्रान् नयति। (व्याघ्री अपने दाँतों से अपने शावकों को ले जाती है।)

(ख) वर्णाः कथं प्रयोक्तव्याः ? (अक्षरों का प्रयोग किस प्रकार करना चाहिए?)

उत्तरम्: वर्णाः स्पष्टतया न च पीडयित्वा प्रयोक्तव्याः। (अक्षरों का उच्चारण साफ़-साफ़ और बिना दबाव के करना चाहिए।)

(ग) पाठकानां षट्-गुणाः के भवन्ति ? (पाठकों के कौन-कौन से छह गुण बताए गए हैं?)

उत्तरम्: पाठकानां षट् गुणाः – माधुर्यम्, अक्षरव्यक्तिः, पदच्छेदः, सुस्वरः, धैर्यम्, लयसमर्थता च भवन्ति। (पाठकों के छह गुण होते हैं – मधुरता, अक्षरों का सही उच्चारण, शब्दों का ठीक विभाजन, सुंदर स्वर, धैर्य और लय का ज्ञान।)

(घ) के अधमाः पाठकाः भवन्ति ? (किस प्रकार के पाठक अधम कहलाते हैं?)

उत्तरम्: गीती, शीघ्री, शिरःकम्पी, लिखितपाठकः, अनर्थज्ञः, अल्पकण्ठश्च अधमाः पाठकाः भवन्ति। (जो गाने की तरह पढ़ते हैं, बहुत तेज़ पढ़ते हैं, सिर हिलाकर पढ़ते हैं, केवल लिखकर पढ़ते हैं, अर्थ नहीं समझते और धीमी आवाज़ में पढ़ते हैं – वे अधम पाठक होते हैं।)

(ङ) ‘स्वजनः’ ‘श्वजनः’ च इत्यनयोः अर्थदृष्ट्या कः भेदः ? (‘स्वजन’ और ‘श्वजन’ शब्दों में अर्थ के आधार पर क्या अंतर है?)

उत्तरम्: ‘स्वजनः’ इत्यस्य अर्थः बान्धवः, ‘श्वजनः’ इत्यस्य अर्थः शुनकः अस्ति। (‘स्वजन’ का अर्थ है संबंधी/अपना जन, और ‘श्वजन’ का अर्थ है कुत्ता।)

(च) ‘सकलं’ ‘शकलं’ च इत्यनयोः अर्थदृष्ट्या कः भेदः ? (‘सकलं’ और ‘शकलं’ शब्दों में अर्थ के आधार पर क्या भिन्नता है?)

उत्तरम्: ‘सकलं’ इत्यस्य अर्थः सम्पूर्णम्, ‘शकलं’ इत्यस्य अर्थः खण्डः अस्ति। (‘सकलं’ का अर्थ है सम्पूर्ण (पूरा), और ‘शकलं’ का अर्थ है टुकड़ा या खंड।)

४. अधोलिखितानि लक्षणानि पाठकस्य गुणाः वा दोषाः वा इति विभजत – (नीचे दिए गए लक्षण यह बताइए कि वे पाठक के गुण हैं या दोष।)

अक्षरव्यक्तिः, शीघ्री, लिखितपाठकः, लयसमर्थम्, अनर्थः, अल्पकण्ठः,
माधुर्यम्, गीती, पदच्छेदः, शिरःकम्पी, अनर्थज्ञः, धैर्यम्, सुस्वरः

गुणाः (सुपाठक के गुण)दोषाः (कुपाठक के दोष)
अक्षरव्यक्तिः (स्पष्ट रूप से उच्चारण करने वाला)शीघ्री (बहुत जल्दी-जल्दी पढ़ने वाला)
लयसमर्थम् (लय को समझकर पढ़ने वाला)लिखितपाठकः (केवल लिखकर ही पढ़ने वाला)
माधुर्यम् (मीठी वाणी से पढ़ने वाला)अनर्थः (अर्थ का ध्यान न रखने वाला)
पदच्छेदः (शब्दों को ठीक प्रकार से अलग करने वाला)अल्पकण्ठः (बहुत धीमी आवाज़ में पढ़ने वाला)
धैर्यम् (धैर्यपूर्वक पढ़ने वाला)गीती (गाने की तरह पढ़ने वाला)
सुस्वरः (सुंदर स्वर में पढ़ने वाला)शिरःकम्पी (सिर हिलाते हुए पढ़ने वाला)
—अनर्थज्ञः (पाठ का अर्थ न जानने वाला)

५. श्लोकानुसारं रिक्तस्थानानि उचितैः शब्दैः पूरयत – (श्लोक के आधार पर रिक्त स्थानों को सही शब्दों से भरें।)

(क) भीता पतनभेदाभ्यां तद्वद् वर्णान् प्रयोजयेत्। (श्लोक २ के अनुसार, जिस प्रकार बाघिन अपने बच्चों को सावधानी और डर के साथ उठाती है, वैसे ही वर्णों का प्रयोग करना चाहिए।)

(ख) माधुर्यमक्षरव्यक्तिः पदच्छेदस्तु सुस्वरः धैर्यं लयसमर्थं च षडेते पाठका गुणाः। (श्लोक ४ के अनुसार, मधुरता, स्पष्ट उच्चारण, शब्द-विभाजन, सुस्वर, धैर्य और लय की समझ — ये पाठक के छह गुण हैं।)

(ग) गीती शीघ्री शिरःकम्पी तथा लिखितपाठकः। (श्लोक ५ के अनुसार, जो गाने की तरह पढ़ता है, बहुत तेज़ पढ़ता है, सिर हिलाता है और लिखकर पढ़ता है — वह दोषयुक्त पाठक कहलाता है।)

(घ) एवं वर्णाः प्रयोक्तव्या नाव्यक्ता न च पीडिताः। (श्लोक ३ के अनुसार, वर्णों का प्रयोग न तो अस्पष्ट और न ही दबाकर करना चाहिए।)

(ङ) स्वजनः श्वजनो माभूत् सकलं शकलं सकृत् शकृत्। (श्लोक १ के अनुसार, यदि उच्चारण गलत हो जाए तो ‘स्वजन’ ‘श्वजन’ बन जाता है और अर्थ पूरी तरह बदल जाता है।)

६. अधोलिखितानि वाक्यानि सत्यम् वा असत्यम् वा इति लिखत – (नीचे दिए गए वाक्यों के बारे में लिखो कि वे सत्य हैं या असत्य।)

यथा– पदच्छेदः पाठकानां गुणः अस्ति। सत्यम् / असत्यम्

सत्यम् (श्लोक ४ में पदच्छेद को अच्छे पाठक का गुण बताया गया है।)

(क) गानसहितपठनं पाठकानां दोषः भवति।
सत्यम् (श्लोक ५ में ‘गीती’ को अधम पाठक का दोष कहा गया है।)

(ख) माधुर्यं नाम अक्षराणाम् उच्चारणे स्पष्टता अस्ति।
असत्यम् (श्लोक ४ के अनुसार माधुर्य का अर्थ है मधुरता, जबकि स्पष्ट उच्चारण को अक्षरव्यक्तिः कहा गया है।)

(ग) शकृत् नाम एकवारम् इति अर्थः अस्ति।
असत्यम् (श्लोक १ में ‘शकृत्’ का अर्थ मल है, जबकि ‘सकृत्’ का अर्थ एक बार है। यह गलत उच्चारण का उदाहरण है।)

(घ) अव्यक्ताः वर्णाः प्रयोक्तव्याः भवन्ति।
असत्यम् (श्लोक ३ के अनुसार, अस्पष्ट वर्णों का प्रयोग वर्जित है।)

(ङ) व्याघ्री यथा पुत्रान् हरति तथा वर्णान् प्रयोजयेत्।
सत्यम् (श्लोक २ में बाघिन द्वारा शावकों को सावधानी से उठाने की तुलना वर्णों के सही प्रयोग से की गई है।)

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