अभ्यासात् जायते सिद्धिः
१. अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन द्विपदेन वा उत्तरत – (नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर एक शब्द या दो शब्दों में दीजिए।)
(क) उरसि किं तन्त्रं भवति? (छाती में कौन-सी यंत्रणा / प्रणाली पाई जाती है?)
उत्तर – वायुबलतन्त्रम्। (वायु-बल प्रणाली।)
(ख) नाभिप्रदेशे स्थिताः मांसपेश्यः किं नोदयन्ति? (नाभि के पास स्थित मांसपेशियाँ किसे गति देती हैं?)
उत्तर – श्वासप्रवृत्तिम्। (श्वसन की प्रक्रिया।)
(ग) आस्यस्य आभ्यन्तरे वार्णानाम् उत्पत्त्यर्थं द्वितीयं तत्त्वं किम् अस्ति? (मुख के भीतर वर्णों की उत्पत्ति के लिए दूसरा तत्त्व कौन-सा है?)
उत्तर – करणम्। (करण अर्थात उच्चारण का साधन।)
(घ) आस्ये कति स्थानानि सन्ति? (मुख के भीतर कितने उच्चारण-स्थान होते हैं?)
उत्तर – षट् स्थानानि। (छह स्थान।)
(ङ) स्थानस्य कार्यनिदर्शनार्थं किं समुचितम् उदाहरणम् अस्ति? (उच्चारण-स्थान के कार्य को समझाने के लिए कौन-सा उचित उदाहरण है?)
उत्तर – मुरली। (बाँसुरी।)
(च) करणानि मुरल्याः कस्य भागम् इव व्यवहरन्ति? (बाँसुरी में करण किस भाग की तरह कार्य करते हैं?)
उत्तर – अङ्गुलीभागस्य। (अंगुलियों के भाग की तरह।)
२. अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखत। – (नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर पूरे वाक्य में लिखिए।)
(क) करणं किं भवति? (करण किसे कहते हैं?)
उत्तरम् – करणं तदङ्गं भवति, यत् वर्णस्य उच्चारणसमये स्थानं स्पृशति वा समीपं याति। (करण वह अंग होता है, जो वर्ण का उच्चारण करते समय स्थान को छूता है या उसके निकट पहुँचता है।)
(ख) उरः श्वासकोशस्थितं वायुं कुत्र निःसारयति? (छाती (उरः) फेफड़ों में भरी वायु को कहाँ बाहर निकालती है?)
उत्तरम् – उरः श्वासकोशे स्थितं वायुं ऊर्ध्वं निःसारयति। (छाती फेफड़ों में स्थित वायु को ऊपर की ओर निकालती है।)
(ग) मुरल्याः अङ्गुलिच्छिद्राणि कीदृशं व्यवहरन्ति? (बाँसुरी के छिद्र किस प्रकार काम करते हैं?)
उत्तरम् – मुरल्याः अङ्गुलिच्छिद्राणि आस्यस्य स्थानानि इव व्यवहरन्ति। (बाँसुरी के छिद्र मुख के उच्चारण-स्थान जैसे कार्य करते हैं।)
(घ) केषां वर्णानाम् उच्चारणे जिह्वा प्रायः निष्क्रिया भवति? (किन वर्णों के उच्चारण में जीभ लगभग निष्क्रिय रहती है?)
उत्तरम् – कण्ठ्यानां, ओष्ठ्यानां, नासिक्यानां च वर्णानाम् उच्चारणे जिह्वा प्रायः निष्क्रिया भवति। (कण्ठ्य, ओष्ठ्य और नासिक्य वर्णों के उच्चारण में जीभ लगभग निष्क्रिय रहती है।)
(ङ) तालव्यानां, मूर्धन्यानां, दन्त्यानां च वर्णानाम् उच्चारणार्थं सामान्यं करणं किम् अस्ति? (तालव्य, मूर्धन्य और दन्त्य वर्णों के उच्चारण में समान करण कौन है?)
उत्तरम् – तालव्यानां, मूर्धन्यानां, दन्त्यानां च वर्णानाम् उच्चारणार्थं सामान्यं करणं जिह्वा भवति। (तालव्य, मूर्धन्य और दन्त्य वर्णों के उच्चारण में समान करण “जीभ” है।)
(च) कण्ठ्यानां, ओष्ठ्यानां, नासिक्यानां च वर्णानाम् उच्चारणार्थं स्थानस्य करणस्य च मध्ये किं भवति? (कण्ठ्य, ओष्ठ्य और नासिक्य वर्णों के उच्चारण में स्थान और करण के बीच क्या संबंध होता है?)
उत्तरम् – कण्ठ्यानां, ओष्ठ्यानां, नासिक्यानां च वर्णानाम् उच्चारणे स्थानमेव करणं भवति। (कण्ठ्य, ओष्ठ्य और नासिक्य वर्णों के उच्चारण में स्थान ही करण का कार्य करता है।)
३. अधोलिखितेषु वाक्येषु आम् / न इति लिखित्वा उचितभावं सूचयत – (नीचे दिए गए वाक्यों में उचित भाव बताने के लिए ‘हाँ’ या ‘नहीं’ लिखिए।)
(क) श्वासकोशस्थितः वायुः ऊर्ध्वं चरन् पूर्वम् आस्यं प्राप्नोति।
हिन्दी – फेफड़ों में भरी हुई वायु ऊपर उठते समय सबसे पहले मुँह तक पहुँचती है। उत्तरम् – न
(ख) सर्वप्रथमं नाभि-प्रदेशे स्थिताः मांसपेश्याः कण्ठं नोदयन्ति।
हिन्दी – सबसे पहले नाभि क्षेत्र की मांसपेशियाँ कंठ को ऊपर उठाती हैं। उत्तरम् – न
(ग) आस्यस्य आभ्यन्तरे वर्णानाम् उत्पत्त्यर्थम् आभ्यन्तर-प्रयत्नः आवश्यकम् अस्ति।
हिन्दी – मुँह के भीतर वर्णों की उत्पत्ति के लिए आंतरिक प्रयत्न ज़रूरी होता है।
उत्तरम् – आम्
(घ) तालव्य-वर्णनाम् उच्चारणार्थं दन्तः स्थानं स्पृशति।
हिन्दी – तालव्य वर्णों के उच्चारण के लिए दाँत स्थान को छूता है।
उत्तरम् – न
(ङ) मूर्धन्यानां वर्णानाम् उच्चारणार्थं जिह्वा स्थानं स्पृशति।
हिन्दी – मूर्धन्य वर्णों के उच्चारण के समय जीभ स्थान को स्पर्श करती है।
उत्तरम् – आम्
(च) तत्तत्स्थानस्य एव कश्चित् पूर्वभागः, तत्तत्स्थानस्य परभागं स्पृशति।
हिन्दी – प्रत्येक उच्चारण-स्थान का कोई आगे का भाग, उसी स्थान के पिछले भाग को छूता है।
उत्तरम् – आम्
४. मुखे उपलभ्यमानानि स्थानानि बहिष्ठात् अन्तः यथाक्रमं (अर्थात् विपरीत-क्रमेण) लिखन्तु – (नीचे दिए गए वाक्यों में सही भाव को बताने के लिए ‘हाँ’ या ‘नहीं’ लिखें।)
(क) मूर्धा – तालु – कण्ठः
हिन्दी – मूर्धा के बाद तालु आता है, फिर कण्ठ।
(ख) दन्तः – मूर्धा – तालु – कण्ठः
हिन्दी – दाँत के पश्चात मूर्धा, फिर तालु और उसके बाद कण्ठ।
(ग) तालु – कण्ठः
हिन्दी – तालु के बाद कण्ठ स्थित होता है।
(घ) कण्ठः – (मुख का सबसे भीतर का उच्चारण-स्थान)
हिन्दी – कण्ठ सबसे अंदर का उच्चारण स्थान होता है।
(ङ) ओष्ठः – दन्तः – मूर्धा – तालु – कण्ठः
हिन्दी – होंठों के बाद दाँत, फिर मूर्धा, उसके बाद तालु और अंत में कण्ठ आता है।
५. यथायोग्यं मेलनं कुरुत –
(उचित मेल करें।)
| सामान्य-स्थान | विशेष-स्थान | सामान्य-करण | विशेष-करण |
|---|---|---|---|
| ओष्ठः | उत्तर ओष्ठः | स्वस्थानं करणम् | अधर ओष्ठः |
| दन्तः | दन्तः | जिह्वा करणम् | जिह्वाग्रः |
| नासिका | नासिकामूल का ऊपरी भाग | स्वस्थानं करणम् | नासिकामूल का निचला भाग |
| कण्ठः | कण्ठ का पृष्ठभाग | जिह्वा करणम् | कण्ठ का अग्रभाग |
| मूर्धा | मूर्धा | स्वस्थानं करणम् | जिह्वोपाग्रः |
| तालु | तालु | जिह्वा करणम् | जिह्वामध्यः |